इस कहानी / दास्ताँ /घटना के नायक एक वृद्ध सिंह है, जो कि युवावस्था में समीप के वन में कार्यरत था , पर सेवानिवृत्ति के पश्चात् सपरिवार यहीं इस जंगल में रहने लगा था । परिवार में एक पुत्र, एक पुत्री और पत्नी थे ।
पत्नी सरल और सहृदय, इधर पुत्र और पुत्री अपने अस्तित्व को स्थापित करने में लगे हुए थे । सब कुछ सामान्य सा था, परन्तु एक सामान्य पर अद्भुत घटना घटी ।
जंगल में जल की समस्या आ गई । सिद्धांतों व नियमों पर चलने वाला सिंह ने जब देखा कि जंगल की नदी में पानी पानी है, पर वह आम लोगों को उपलब्ध नहीं, यह सब खास लोगों के लिए हैं । अकेला सिंह ही जीवित (जागृत) था, बाकि सभी प्रजा मृत प्रायः थी । उनका होना या न होना कोई महत्व नहीं रखता था ।
उस सिंह ने वहाँ के नेता गीदड़ के खिलाफ कुछ करने की ठान, महागीदड़ प्रमुख नेता को दूरभाष पर शिकायत दर्ज की । परन्तु इस क्रिया का प्रभाव सकारात्मक न हो कर, नकारात्मक पड़ा ।
महागीदड़- गीदड़ का जयेष्ट निकला । महागीदड़ ने गीदड़ को सिंह की आवाज़ शांत करने का निर्देश दे डाला । गीदड़ ने तुरन्त अपने पियक्कड़ श्वानदल (आवारा गुंडों) को सिंह को उठालाने का आदेश दे दिया ।
सिंह के यहाँ चार दुपहिया वाहन पर आठ श्वान आए । एक श्वान ने कहाँ क्यों यहाँ सिंह रहता है, सिंह ने कहाँ नहीं वे चले गये हैं । मैं पड़ोसी हूँ ।बस इतना हुआ ही नहीं था कि दूर रह रहे मृत क्रोष्ट्र(अ) एकदम जागकर(जीवित होकर) श्वानों को इशारा कर दिया । और श्वानो ने सिंह को दबोच लिया, वृद्ध सिंह भंयकर डर गया, सभी के सामने से वे सिंह को ले गए ।
गीदड़ कुर्सी पर बैठा था । सिंह के मन में कई उहापोह चल रहे थे,पर वह नियति मान, मौन खड़ा रहा । सिंह से पूछा गया कि क्या किया तुमने, क्या तुम्हें शोभा देता है, यह काम छोड़ दो और शिकायत लेकर माफीनामा(क्षमायाचना) लिख दो ।
सिंह वृद्ध था, सोचता कि घर है, समाज है, मैं हूँ, मेरा देश है, अंतरात्मा है, क्या किया जाये? इम्तिहान की घड़ी हैं । उसने तुला के एक तरफ सिद्धांत(सत्य) और दूसरी तरफ स्वार्थ रख तौला ओर निर्णय ले लिया । ' जो मुझे करना था, मैंने किया अब जो आप को करना है, आप कीजिये ।'
बंदी सिंह पर आठों श्वान लपक पड़े ओर लपकते भी क्यों न ? गीदड़ का झूठा ही तो खाते थे। वृद्ध सिंह का शिकार कर डाला और उसे उसी नदीं में दफना दिया । जब सिंह परिवार रक्षक विभाग में जाकर गुहार करने लगा । तब प्रमुखाधिकारी क्रोष्ट्र(ब) ने कहा -'' हम प्रयासरत है, शव प्राप्ति पर सर्वप्रथम हम आप को ही सूचित करेंगे ।''
ये घटना आज भी माँ अपने बच्चों को सुनती हैं । इसमें भी दो पहलू है कि एक या तो वृद्ध सिंह बनाना, जो मरते समय तक सत्य नहीं छोड़ा । दूसरा या तो गीदड़ बनना, जो आख़िर तक मुक्त रहा ।
इस घटना ने मुझे हिला दिया, सोचने पर मजबूर कर दिया। कि क्या ?
१. ये शहर , कस्बे, समाज, या देश में इस तरह तो नहीं हो रहा ?
२. क्या कोई सिंह इस तरह समाप्त तो नहीं हो रहा ?
३. क्या वास्तव में श्वान दल हैं ?
४. आख़िर क्यों इन गीदड़ों को नेतृत्त्व दिया जाता हैं ?
५. सुधीसमाज मृत प्राय क्यों हो गया ?
६. इसी तरह कोष्ट्र दूर से इशारा कर अपनों को समाप्त करते रहेंगें ?
७. रक्षक मात्र मूर्ति स्वरूप और रक्षकालय प्रार्थनास्थल होते जा रहे हैं ?
८. महागीदड़ - गीदड़ - श्वान दल , कोष्ट्र इस प्रकार का क्रम कब तक बनता रहेगा ?
९. आने वाली पीढ़ी गीदड़, महा गीदड़, श्वानों, कोष्ट्र की होगी ?
१०. क्या इस समस्या का समाधान है, अगर है, तो क्या? अगर नहीं है, तो क्यों नहीं ?
११. इस स्थिति के निर्माण का प्रमुख कारण क्या हो सकता है,इसका भविष्य क्या होगा ?
१२. ये घटना जंगल में मान्य हो सकती है क्योंकि आप पशु से क्या अपेक्षा रख सकते हो । अगर यह घटना मानव समाज में घट जाये तो क्या बहुत बड़े परिवर्तन की आवश्यकता पड़ेगी ?
१३. क्यों न मानव की परिभाषा ही बदल दी जाये ?
१४. अगर इन प्रश्नों का जवाब आप के पास है, तो क्या आप कर रहे हैं ?
आप का जवाब कुछ भी हो, आप किसी भी श्रेणी में आते हो, इसका आकलन अपने बुद्धि बल से करें ।
'' क्रांति ही समस्त समस्या / नवनिर्माण /उद्विकास / निर्वाण / मोक्ष का मार्ग हैं ।''
पढ़ने के लिए धन्यवाद और गलती के लिए क्षमा चाहता हूँ ।
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