शनिवार, 9 अप्रैल 2016

न्यायालय

                         न्यायालय


न्यायालय - न्याय का मंदिर और न्यायधीश, न्यायालय का ईश्वर सभी सर्वोच्च । न्याय स्वयं ईश्वर है । जहाँ न्याय नहीं, वहाँ ईश्वर नहीं, जहाँ ईश्वर नहीं, वहाँ प्रकृति नहीं, जीवन नहीं । 
न्यायालय और न्याय प्रक्रिया का सम्मान सदा रहा है, और सदा रहेगा ।
इसका व्यवहार समझ से परे है, यह सब मानव पर निर्भर करता हैं । पर मानव जो चाहे कर लें, पर मूल नहीं बदल सकता । न्याय - अन्याय, मानव दोनों करता है, पर उच्च संस्थनों में सिर्फ न्याय का स्थान होना चाहिए ।  होना चाहिए ? यह सोचने पर मजबूर करता है । न्यायालय, न्यायाधीश, न्याय प्रक्रिया, न्याय पर इंसान को बोलने का अधिकार है या नहीं? और हो या न हो पर मन में में उठे प्रश्नों का क्या ? प्रश्न अपने हल स्वयं खोजता हैं ।  हल को पाए बिना नहीं  रह सकता  ।
         न्याय अपने आप में स्वयं सिद्ध हैं । और वह सभी को मिलता हैं ।
पर दीखता नहीं हैं । पर हम ने देखने और दिखने वाला न्याय बनाया है, तो फिर  इस पर हम सुन और सुना भी सकते हैं । न्याय और न्याय से संबद्ध सभी विषयों पर बोल भी सकते है, मांग भी सकते हैं ।
     इंसान से इंसान कोई अन्याय न कर दे, इसलिए इंसानों ने इंसान के लिए इन संस्थनों को बनाया  हैं । पर इन संस्थनों में इन्सान ही होते है , यह भूल गया । इंसान स्वयं पूर्ण नहीं होते हैं । और गलती की गुंजाईश होती हैं । तो ठीक इस गलती पर बोला जा सकता हैं  ।
      नियमन न्याय से अलग  हैं । नियमन के विषय में नियामक पर सब आ जाता हैं । तो समुदाय का दोष कहाँ ? हमने सभी संस्थाओं को हमारी सहुलियतों के लिए बनाया था, न की भस्मासुर ।

         पढ़ने के लिए धन्यवाद और गलती के लिए क्षमा चाहता हूँ ।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

भारत माता की जय

           भारत माता की जय 

                

मुझे लगता है एक दिन ऐसा आएगा । कि हर पाकिस्तानी भाई आएगें  और अपने हिन्दुस्तानी भाइयों के गले मिलेगें । दोनों खूब रोएगें, खूब गिले-शिकवे दूर होगें । इसके बाद खुशी का ऐसा उत्सव होगा । कि पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल होगा ।
भारत माता के दो बेटे है - भारत और पाकिस्तान । आजादी के पहले एक ही बेटा था पर आजादी के बाद दो हो गये । घर टूट गया । भारत भाई अपने भाई पाकिस्तान को समझाते हुए-
ऐ मेरे प्रिय भाई !

 हम कब अलग थे ? यह तू बता ।
हम अलग क्यों और कब हुए ? यह भी बता ।
हमें किसने अलग किया ? यह भी बता ।
हम तो आरंभ से एक थे, अंत तक एक रहेगें ।

हमने तो कई जीवन साथ जिया ।
हमने माँ का प्यार साथ पाया ।
हमने बचपन का साथ निभाया ।
फिर भी कभी अड़े नहीं ।
फिर भी कभी लड़े नहीं ।

हम एक ही माँ की संतान है ।
गुलामी के दिन को याद कर,उस माँ को याद कर ।
माँ की गोद में साथ जीये- साथ मरे, उन दिनों को याद कर।
उस माँ को याद कर, उस माँ को याद कर ।

आज भी तू मुझसे जुदा नहीं ।
खफा है क्यों, पता नहीं  ।

घर का गौरव हमने बढ़ाया ।
माँ की सेवा हमने की  ।
माँ को आजादी लाकर हमने दी  ।
हर बुराई से हम लड़े ।
हर संकट के सामने हम अड़े  ।

जब एक होकर खड़े हुए, उन दिनों को याद कर।
तंगहाली में साथ रहे, उन दिनों को याद कर ।

इतना विष क्यों पीता है ?
इतना आग में क्यों जलता है ?
इतना पराया कर दिया,
अपने दुःख में भूल गया ।

अपने दुःख में मदद नहीं लेता क्यों ?
खुद दुःख में रह कर, मुझें दुःखी करता क्यों ?

ऐ मेरे प्रिय भाई !
आज भी में तुझसे प्यार करता हूँ ।
मैं कुछ भुला नहीं, तू क्यों भूल जाता है ।
मेरी कामना इतनी है, खुश रहे,  जहाँ रहे आबाद रहे । 

तेरे दुःख में, मैं दुःखी हूँ ।
तेरे सुख में, मैं सुखी हूँ ।

अकेला कब तक खड़ा रहेगा ।
अब तो घर आ जाओ ।
बाललीला अब छोड़ दो ।
अब तो बडे बन जाओ ।
एक माँ की संतान है प्यारे ।
यह कभी भूल न जाना ।
यह कभी भूल न जाना ।

तेरी चिंता मुझें है ज्यादा ।
तू है, मेरा सबसे प्यारा ।

ऐ प्रिय भाई !
यह गुस्सा नहीं है अच्छा,यह रास्ता भटकती,
घर से दूर ले जाती, स्वयं का नाश कराती,
साथ ही साथ स्वजनों को नुकसान पहुंचाती ।

ऐ प्रिय भाई !
देख विचार कर, एक हो विचार कर।
आगे बढ़ विचार कर, मिल कर चल, विचार कर ।

पढ़ने के लिए धन्यवाद, गलती के लिए क्षमा चाहता हूँ ।