सोमवार, 28 मार्च 2016

शिक्षा

                                                    शिक्षा


प्राकृताचार उत्तम आचार हैं । पर मनुष्य अन्य प्राणियों में विशेष प्राणी है, जिसमें अन्य प्राणियों के अंत में क्रम हैं ।

 आज की शिक्षा ने दो धारी तलवार का काम किया हैं । शिक्षा से ज्ञान नहीं बढ़ा, ह्रास हुआ । छात्र  निर्दोष है, तो दोषी कौन ? आज विधिवत शिक्षा कहीं नहीं, उस शिक्षा का जीवन में प्रयोग नगण्य, अकर्मण्यता से अवसाद और व्यवहारिक दोषों का होना ।
जो कर सकता है, वह कर नहीं रहा और जो कर रहा है,वह भी गलत ।हम पहले ही कह चुकें, बात हृदय के आधार पर, मस्तिष्क का लेना देना नहीं, इसलिए हम युक्ति, तर्क, उदाहरण, सादृश्य का प्रयोग नहीं करेगें ।
उच्च स्तर पर विराजमान को पता नहीं कि नीचे क्या हो रहा हैं ? समस्या यह हैं । हमें साथ चलना होगा, मेरे हृदय में जो हो रहा वह हमारें हृदय में होना चाहिए । सूर्य को दीप दिखाना ठीक नहीं , पर रात्रि में चलना पड़े तो दीप काम करेगा । रात्रि में अंधकार का क्षेत्र है, सूर्य और दीप स्व प्रकाशित हैं ।
आडम्बर को समाप्त करना आवश्यक है, पर पूर्ण समाप्ति असंभव । समाज जिसे सत्य समझ रहा चुका है वास्तव में वह कुछ और ही हैं ।
पशुओं में मनुष्य से अच्छा अनुशासन होता है, और पशुओं से अच्छा अनुशासन  वृक्षों - पोधों  में देखा जा सकता है, कितना उत्तम हैं । मनुष्य पर निकृष्टता का कारण अज्ञात हैं । यह अंत: विज्ञान का विषय, इसकी चर्चा की मनाई हैं ।

प्रश्न परिभाषा का भी है, आप जिसकी परिभाषा जो करते हो, वह वैसी ही अन्तग्रहित की जाती हैं । हम अगर परिभाषा  ही बदल दें तो क्रांति का पहला मार्ग खुल सकेगा ।
हमें नया कुछ नहीं करना और हम नया कुछ कर भी नहीं सकते, सिर्फ खोजना है, जिसे हमनें खो दिया, या जिसकी ओर हम आँखे मुंदे खड़े हैं । इंसानों की  एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, पूरा नए संस्करण पर प्रभाव रह जाता है, परिवर्तन पूर्ण नहीं हो पाता हैं ।
वास्तव में खास, आम को समझ नहीं सकता और आम, खास को । खास जब आम होता है, तब समझता है, खास होते ही भूल जाता हैं । विज्ञान जिस आदर्शता  शत - प्रतिशत  को नकारता हैं । हमें उसी आदर्शता को शत - प्रतिशत करनें में जीवन लगाना होगा ।
विचार से ज्यादा कर्म करे पर वे यही करते हैं । हम विचार ज्यादा पर कर्म  नहीं करते यहीं विषय है ।
      
    
          

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