भ्रष्टाचार
समस्या है तो समाधान भी । मगर समाधान ही समस्या बन जाए तो फिर कुछ करना मुश्किल हो जाता हैं। आज हम जिस मस्तिष्क के गुलाम है, उसे हमने अपना स्वयं का नियंत्रण दे दिया है, जबकि हमें हृदय का अनुगमन करना चाहिए ।इसलिए यहाँ वैज्ञानिकीय भाषा का प्रयोग नहीं हो सकेगा। क्योंकि हम उस विषय पर खड़े है, जिसका मार्ग गुप्त और अज्ञात सा है, अगर अभी गलत मार्ग चुन लिया तो मंजिल ही न मिल पाए । स्वप्न देखना अच्छा है, महत्वकांक्षा भी ,अतिवाद भी,परन्तु इस स्थिति में मनुष्य पाना चाहता है, पर वह सब कुछ खो बैठता है ।
भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचार एक विषय है । सर्वप्रथम हमें विवेक की आवश्कता है, प्रत्येक परिस्थिति में विवेक का मार्ग भिन्न है, और कुल समुच्च शून्य ही हो जाता है ।
जीवन सूत्रों पर जीना ठीक है, जीवन सूत्र नहीं है ।
भ्रष्टाचार के समाधान ही भविष्य की नई समस्या होगें। क्योंकि प्रत्येक निकाय का कार्य कुल समुच्चय शून्य कर देता है । कुछ सरल बातें करते है । हम स्वयं भ्रष्ट है,पर पता नहीं । सत्य, सर्वोच्च सत्य, व्यवहारिक सत्य और यथार्थ सभी अलग है । समाज की सतह का भ्रष्ट होना, गहराई में कुछ खराबी है । उस पर ध्यान लगाना चाहिए । अगर भ्रष्ट, दूसरे भ्रष्ट से भ्रष्टाचार का उन्मूलन का मार्ग पूछकर अनुसरण करें, तो उन्मूलन होगा ? नहीं होगा । शक्ति और काल का व्यर्थ प्रयोग रहा ।
भ्रष्टाचार को हटाना संभव है, मिटाना, समाप्त करना असंभव है । परन्तु हमें कार्य का मानक बनाना है, तो भ्रष्टाचार मिटाने के कर्म में और भ्रष्टाचार को बढाना ठीक नहीं, हमें एक ऐसा आचार लाना होगा जो इस आचार का स्थान ले सके । और वो आचार पहले समाज में व्याप्त था,जिसे भ्रष्टाचार ने स्थानांतरित किया था । यह एक धीमी और असरदार प्रक्रिया है ।

हमारे विश्व में जो भ्रष्टाचार फैला है, और पनप रहा है, और उसकी जड़ का फैलाव नए-नए वृक्ष तैयार कर रहा हैं । इन सबका निराकरण तो नहीं, पर कुछ विशेष कर्म तो है, हमें पुनः शिष्टाचार का आगम कराना होगा । पर समय पुनः है यह कराएगा कौन ? कोई नहीं ।
संस्कृति अन्दर ही अन्दर खोखली हो रही है । ऋणात्मक विचार की मनाई और धनात्मक सोच की नीति आज का सूत्र है, पर सच है ऋणात्मक विचार और धनात्मक कर्म । भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए सूत्रों, मानसिक प्रक्रियाओं अथवा अन्य प्रक्रियाओं की शक्ति निर्वीय हो गई हैं । हम अन्त: ज्ञान की बात नहीं करेगें । क्योंकि इसकी मनाई हैं । समयों, परिस्थियों और आवश्कताओं पर आज्ञा से प्रयोग होता हैं ।
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