आतंकवाद
आतंकवाद

हमें सरकार की नहीं, सहकार की स्थापना करवानी चाहिए, विकास के लिए उत्तम हैं ।
अगर समस्या बम लगती हो, तो इसका समाधान हम हैं। अगर विश्व में सब हम हो जाए, तो हमें यह समस्या नहीं रह जाएगी । हम होना ही कई समस्याओं का समाधान हैं । ध्रुवीकरण को रोकना होगा, बिना लक्ष्य के हमें, हम होना होगा । सतहीय संकीर्णता का नाश आवश्यक हैं । अगर लक्ष्य लेकर हम बनें तो विकृतियाँ आ सकती हैं ।
हमें क्रांति लानी होगी, पर इस के लिए उर्जा के ज्वार की आवश्यकता होगी । परन्तु क्रांति नियंत्रित नहीं होती है, इसमें कुछ खोने का डर अवश्य होता है, जो कि मूल्यवान होता हैं ।

आतंकवाद और नक्सलवाद समस्या से ज्यादा इसका निराकरण समस्याजन्य हैं ।
पहले आतंक और वाद को समझे, वाद शीघ्र समाप्त हो जाते है, पर इनका प्रभाव चिर स्थाई होता हैं । आंतक कहाँ नहीं है ? और किसे नहीं है ? कहीं भी हो सकता है? पहले बालक माता-पिता से , फिर विद्यालय में शिक्षक से, बाहर मित्रों से, असामाजिक तत्वों से, घटनाओं से - दुर्घटनाओं से, भ्रष्टाचार-गरीबी-मंहगाई-अन्याय से, डर का लावा जब फूटता है, तो आंतक के रूप में दिखता हैं । यह डर की प्रतिक्रिया हैं । आतंकवाद के जनक अप्रत्यक्ष रूप से सभी ही हैं । अगर विश्व परिवेश में हम भयभीत है, तो आतंक होता हैं । यह प्राकृत हैं । इसलिए हमें निर्भीक होना पडेगा। हमारी गतिविधियाँ भी वैसी रखनी होगी । उनका भय मिटाना होगा न कि ओर भयभीत कर आतंक बढ़ाए ।

देश ही क्यों ? विश्व विकसित हो, पर मूल आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति विकास नहीं हैं । हमने आज तक विकसित देश नहीं देखा, और जो मानते है ,यह उनका भ्रम हैं । कुछ बिन्दुओं को विकास का पैमाना नहीं होना चाहिए ।
उन्नत और पतन दोनों प्रक्रिया समान प्रतीत होती है,क्योंकि इसमें मानव प्रक्रिया के दौरान समझ नहीं पाता कि वह उन्नति की शिखर छुएगा कि पतन की गहराई ।

हमें संतुलन की अति आवश्कता है,पर जिस संतुलन के लिए हम क्रांति करते है, वह असंतुलन लाती हैं । पर यहाँ हमें संभल कर रहना होगा और फिर संतुलन तक चल सकें ।पढने के लिए धन्यवाद , गलती के लिए क्षमा ।
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