रविवार, 11 दिसंबर 2016

नेता

आज नेता शब्द जिसके लिए प्रयोग होता है,वह नेता है, ही नहीं।क्या आप जानते हैं? 

नेता कैसा होता हैं?

नेतृत्व किसे कहते हैं? 

लोकतंत्र में नेता की भूमिका क्या होती हैं? 

नेता का राजनीति से लेना देना नहीं होता हैं। 

नेता में क्या गुण होने चाहिए,यह भी हमें पता नहीं हैं।

 फिर भी हम नेता कहते हैं। 
व्यवस्था के समान्तर व्यवस्था क्यों होता हैं?
इसका मुख्य कारण विश्वास की कमी होना हैं। 

जब हम स्वयं पर विश्वास करते है,तभी हम दूसरो पर विश्वास कर सकते हैं।

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

शिक्षा

शिक्षा ,आप क्या सिखा रहे हैं?

यह सोचने का विषय हैं । हमें स्थिर भी रहना हैं। 

 आप क्या सीख रहे हैं ? 
शिक्षा, नागरिक जीवन तैयार करती हैं। 
नागरिक जीवन ही जीवन है, तो फिर मुश्किले बढना हैं। 
जीवन सिखाया नहीं जा सकता हैं। जीवन तो जीया जाता हैं।
 जीवन तो कला , अनुभव , ज्ञान,उत्सव,आनंद,मुक्त, स्वतंत्र हैं।
दौड़ ,संघर्ष, प्रतिस्पर्धा, शिक्षा है,तो यह चिंता का विषय हैं।हम हमारे चक्रव्यूह में स्वयं फंसते जाते है और
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बुधवार, 13 जुलाई 2016

कहानी(लोकतांत्रिक)


इस कहानी / दास्ताँ /घटना के नायक एक वृद्ध सिंह है, जो कि युवावस्था में समीप के वन में कार्यरत था , पर सेवानिवृत्ति के पश्चात् सपरिवार यहीं इस जंगल में रहने लगा था । परिवार में एक पुत्र, एक पुत्री और पत्नी थे ।
 पत्नी सरल और सहृदय, इधर पुत्र और पुत्री अपने अस्तित्व को स्थापित करने में लगे हुए थे । सब कुछ सामान्य सा था, परन्तु एक सामान्य पर अद्भुत घटना घटी ।
जंगल में जल की समस्या आ गई । सिद्धांतों व नियमों पर चलने वाला सिंह ने जब देखा कि जंगल की नदी में पानी पानी है, पर वह आम लोगों को उपलब्ध नहीं, यह सब खास लोगों के लिए हैं । अकेला सिंह ही जीवित (जागृत) था, बाकि सभी प्रजा मृत प्रायः थी । उनका होना या न होना कोई महत्व नहीं रखता था ।
उस सिंह ने वहाँ के नेता गीदड़ के खिलाफ कुछ करने की ठान, महागीदड़ प्रमुख नेता को दूरभाष पर शिकायत दर्ज की । परन्तु इस क्रिया का प्रभाव सकारात्मक न हो कर, नकारात्मक पड़ा ।
           महागीदड़- गीदड़ का जयेष्ट निकला । महागीदड़ ने गीदड़ को सिंह की आवाज़ शांत करने का निर्देश दे डाला । गीदड़ ने तुरन्त अपने पियक्कड़ श्वानदल (आवारा गुंडों) को सिंह को उठालाने का आदेश दे दिया ।
सिंह के यहाँ चार दुपहिया वाहन पर आठ श्वान आए । एक श्वान ने कहाँ क्यों यहाँ सिंह रहता है, सिंह ने कहाँ नहीं वे चले गये हैं । मैं पड़ोसी हूँ ।बस इतना हुआ ही नहीं था कि दूर  रह रहे मृत क्रोष्ट्र(अ) एकदम जागकर(जीवित होकर) श्वानों को इशारा कर दिया । और श्वानो ने सिंह को दबोच लिया, वृद्ध सिंह भंयकर डर गया, सभी के सामने से वे सिंह को ले गए ।
 गीदड़ कुर्सी पर बैठा था । सिंह के मन में कई उहापोह चल रहे थे,पर वह नियति मान, मौन खड़ा रहा । सिंह से पूछा गया कि क्या किया तुमने, क्या तुम्हें शोभा देता है, यह काम छोड़ दो और शिकायत लेकर माफीनामा(क्षमायाचना) लिख दो ।
 सिंह वृद्ध था, सोचता कि घर है, समाज है, मैं हूँ, मेरा देश है, अंतरात्मा है, क्या किया जाये? इम्तिहान की घड़ी हैं । उसने तुला के एक तरफ सिद्धांत(सत्य) और दूसरी तरफ स्वार्थ  रख तौला ओर निर्णय ले लिया । ' जो मुझे करना था, मैंने किया अब जो आप को करना है, आप कीजिये ।'
 बंदी सिंह पर आठों श्वान लपक पड़े ओर लपकते भी क्यों न ? गीदड़ का झूठा ही तो खाते थे। वृद्ध सिंह का शिकार कर डाला और उसे उसी नदीं में दफना दिया । जब सिंह परिवार रक्षक विभाग में जाकर गुहार करने लगा । तब प्रमुखाधिकारी क्रोष्ट्र(ब) ने कहा -'' हम प्रयासरत है, शव प्राप्ति पर सर्वप्रथम हम आप को ही सूचित करेंगे ।''  

 ये घटना आज भी माँ अपने बच्चों को सुनती हैं । इसमें भी दो पहलू है कि एक या तो वृद्ध सिंह बनाना, जो मरते समय तक सत्य नहीं छोड़ा । दूसरा या तो गीदड़ बनना, जो आख़िर  तक मुक्त रहा ।
 इस घटना ने मुझे हिला दिया, सोचने पर मजबूर कर दिया। कि क्या ?
१. ये शहर , कस्बे, समाज, या देश में इस तरह तो नहीं हो रहा ?
२. क्या कोई सिंह इस तरह समाप्त तो नहीं हो रहा ?
३. क्या वास्तव में श्वान दल हैं ?
४. आख़िर क्यों इन गीदड़ों को नेतृत्त्व दिया जाता हैं ?
५. सुधीसमाज मृत प्राय क्यों हो गया ?
६. इसी तरह कोष्ट्र दूर से इशारा कर अपनों को समाप्त करते रहेंगें ?
७. रक्षक मात्र मूर्ति स्वरूप और रक्षकालय प्रार्थनास्थल होते जा रहे हैं ?
८. महागीदड़ - गीदड़ - श्वान दल , कोष्ट्र इस प्रकार का क्रम कब तक बनता रहेगा ?
९. आने वाली पीढ़ी गीदड़, महा गीदड़, श्वानों, कोष्ट्र की होगी ?
१०. क्या इस समस्या का समाधान है, अगर है, तो क्या? अगर नहीं है, तो क्यों नहीं ?
११. इस स्थिति के निर्माण का प्रमुख कारण क्या हो सकता है,इसका भविष्य क्या होगा ?
१२. ये घटना जंगल में मान्य हो सकती है क्योंकि आप पशु से क्या अपेक्षा रख सकते हो । अगर यह घटना मानव समाज में घट जाये तो क्या बहुत बड़े परिवर्तन की आवश्यकता पड़ेगी ?
१३. क्यों न मानव की परिभाषा ही बदल दी जाये ?
१४. अगर इन प्रश्नों का जवाब आप के पास है, तो क्या आप कर रहे हैं ?
        आप का जवाब कुछ भी हो, आप किसी भी श्रेणी में आते हो, इसका आकलन अपने बुद्धि बल से करें ।
'' क्रांति ही समस्त समस्या / नवनिर्माण /उद्विकास / निर्वाण / मोक्ष का मार्ग हैं ।''   

   पढ़ने के लिए धन्यवाद और गलती के लिए क्षमा चाहता हूँ ।

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

न्यायालय

                         न्यायालय


न्यायालय - न्याय का मंदिर और न्यायधीश, न्यायालय का ईश्वर सभी सर्वोच्च । न्याय स्वयं ईश्वर है । जहाँ न्याय नहीं, वहाँ ईश्वर नहीं, जहाँ ईश्वर नहीं, वहाँ प्रकृति नहीं, जीवन नहीं । 
न्यायालय और न्याय प्रक्रिया का सम्मान सदा रहा है, और सदा रहेगा ।
इसका व्यवहार समझ से परे है, यह सब मानव पर निर्भर करता हैं । पर मानव जो चाहे कर लें, पर मूल नहीं बदल सकता । न्याय - अन्याय, मानव दोनों करता है, पर उच्च संस्थनों में सिर्फ न्याय का स्थान होना चाहिए ।  होना चाहिए ? यह सोचने पर मजबूर करता है । न्यायालय, न्यायाधीश, न्याय प्रक्रिया, न्याय पर इंसान को बोलने का अधिकार है या नहीं? और हो या न हो पर मन में में उठे प्रश्नों का क्या ? प्रश्न अपने हल स्वयं खोजता हैं ।  हल को पाए बिना नहीं  रह सकता  ।
         न्याय अपने आप में स्वयं सिद्ध हैं । और वह सभी को मिलता हैं ।
पर दीखता नहीं हैं । पर हम ने देखने और दिखने वाला न्याय बनाया है, तो फिर  इस पर हम सुन और सुना भी सकते हैं । न्याय और न्याय से संबद्ध सभी विषयों पर बोल भी सकते है, मांग भी सकते हैं ।
     इंसान से इंसान कोई अन्याय न कर दे, इसलिए इंसानों ने इंसान के लिए इन संस्थनों को बनाया  हैं । पर इन संस्थनों में इन्सान ही होते है , यह भूल गया । इंसान स्वयं पूर्ण नहीं होते हैं । और गलती की गुंजाईश होती हैं । तो ठीक इस गलती पर बोला जा सकता हैं  ।
      नियमन न्याय से अलग  हैं । नियमन के विषय में नियामक पर सब आ जाता हैं । तो समुदाय का दोष कहाँ ? हमने सभी संस्थाओं को हमारी सहुलियतों के लिए बनाया था, न की भस्मासुर ।

         पढ़ने के लिए धन्यवाद और गलती के लिए क्षमा चाहता हूँ ।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

भारत माता की जय

           भारत माता की जय 

                

मुझे लगता है एक दिन ऐसा आएगा । कि हर पाकिस्तानी भाई आएगें  और अपने हिन्दुस्तानी भाइयों के गले मिलेगें । दोनों खूब रोएगें, खूब गिले-शिकवे दूर होगें । इसके बाद खुशी का ऐसा उत्सव होगा । कि पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल होगा ।
भारत माता के दो बेटे है - भारत और पाकिस्तान । आजादी के पहले एक ही बेटा था पर आजादी के बाद दो हो गये । घर टूट गया । भारत भाई अपने भाई पाकिस्तान को समझाते हुए-
ऐ मेरे प्रिय भाई !

 हम कब अलग थे ? यह तू बता ।
हम अलग क्यों और कब हुए ? यह भी बता ।
हमें किसने अलग किया ? यह भी बता ।
हम तो आरंभ से एक थे, अंत तक एक रहेगें ।

हमने तो कई जीवन साथ जिया ।
हमने माँ का प्यार साथ पाया ।
हमने बचपन का साथ निभाया ।
फिर भी कभी अड़े नहीं ।
फिर भी कभी लड़े नहीं ।

हम एक ही माँ की संतान है ।
गुलामी के दिन को याद कर,उस माँ को याद कर ।
माँ की गोद में साथ जीये- साथ मरे, उन दिनों को याद कर।
उस माँ को याद कर, उस माँ को याद कर ।

आज भी तू मुझसे जुदा नहीं ।
खफा है क्यों, पता नहीं  ।

घर का गौरव हमने बढ़ाया ।
माँ की सेवा हमने की  ।
माँ को आजादी लाकर हमने दी  ।
हर बुराई से हम लड़े ।
हर संकट के सामने हम अड़े  ।

जब एक होकर खड़े हुए, उन दिनों को याद कर।
तंगहाली में साथ रहे, उन दिनों को याद कर ।

इतना विष क्यों पीता है ?
इतना आग में क्यों जलता है ?
इतना पराया कर दिया,
अपने दुःख में भूल गया ।

अपने दुःख में मदद नहीं लेता क्यों ?
खुद दुःख में रह कर, मुझें दुःखी करता क्यों ?

ऐ मेरे प्रिय भाई !
आज भी में तुझसे प्यार करता हूँ ।
मैं कुछ भुला नहीं, तू क्यों भूल जाता है ।
मेरी कामना इतनी है, खुश रहे,  जहाँ रहे आबाद रहे । 

तेरे दुःख में, मैं दुःखी हूँ ।
तेरे सुख में, मैं सुखी हूँ ।

अकेला कब तक खड़ा रहेगा ।
अब तो घर आ जाओ ।
बाललीला अब छोड़ दो ।
अब तो बडे बन जाओ ।
एक माँ की संतान है प्यारे ।
यह कभी भूल न जाना ।
यह कभी भूल न जाना ।

तेरी चिंता मुझें है ज्यादा ।
तू है, मेरा सबसे प्यारा ।

ऐ प्रिय भाई !
यह गुस्सा नहीं है अच्छा,यह रास्ता भटकती,
घर से दूर ले जाती, स्वयं का नाश कराती,
साथ ही साथ स्वजनों को नुकसान पहुंचाती ।

ऐ प्रिय भाई !
देख विचार कर, एक हो विचार कर।
आगे बढ़ विचार कर, मिल कर चल, विचार कर ।

पढ़ने के लिए धन्यवाद, गलती के लिए क्षमा चाहता हूँ ।






    

मंगलवार, 29 मार्च 2016

राजनीति




आरक्षण का विचार एक समाधान था, पर अब इससे बड़ी समस्या कहीं नहीं । परिस्तिथियां बदलती है, समस्या और समाधान भी । उपस्थानिक जड़े काटने का मतलब नहीं होगा । हमें मूल पर कार्य करना होगा । इस विषय की चर्चा  बाद में भी हो सकती हैं ।

हमें विश्व से राजनीति नामक विशाल समस्या का निराकरण करना होगा, क्योंकि राजनीति तोडती हैं । जिस प्रमुख को राज करना है , वह तोड़ देते है, हम टूट कर कुछ नहीं हो सकते हैं ।
और फिर पतन की गहराई में हम चल दिए है, तो हमें फिर कुछ न सोच, कहानी जल्दी समाप्त कर दें ।
हमें विशाल हृदय बनाना होगा, हमें कर्मठ होना होगा, और हम बाह्य रूप से समाप्त हो भी गए तो हम नित्य, शाश्वत, अनादि रहेगें ।
जनसँख्या,बेरोजगारी,प्रदूष्ण कोई समस्या नहीं हैं । अगर हम, हम हो जाये । परन्तु हम होना ही समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान हैं ।
एक प्रयोग मात्र एक मिनिट तक सब ईमानदार हो जाए, तो हमें विकसित होने में  ज्यादा इंतजार की आवश्यकता नहीं होगी ।
नकल समाधान नहीं हैं । हमें मार्ग स्वयं चुनना होगा ।
समय रुकता नहीं, अत: जीवन में अवरोध बर्दाश्त नहीं,पर लय बिना जीना कुछ नहीं । जो दिख नहीं सकता उसे देखना, जिसे सुना ही नहीं उसे सुनना, अज्ञात को महसूस करना, उसी के साथ जीना ,उसी में एका हो जाना । फिर क्या विच्छेद ? क्या एका ? आनन्द और समाधि।
 मृत हुआ है, मानव ।
अब संस्कृति कौन लाएगा।

नैतिकता के ज्ञान का वाचनालय, किसके द्वारा वाचा जाएगा ।।

हे प्रलयकारी तंद्रा में कब तक मौज उठाएगा ।

धीरे - धीरे तेरा सुख तुझे निगलते जाएगा ।।

क्यों लाशों के साथ सोता है, 

क्यों लाशों के साथ जगता है,

क्यों लाशों में तू जीता है, क्यों लाशों में तू जीता है।।

पढ़ने के लिए धन्यवाद, गलती के क्षमा करें ।

 

आतंकवाद


                                    आतंकवाद

हमें सरकार की नहीं, सहकार की स्थापना करवानी चाहिए, विकास के लिए उत्तम हैं ।
अगर समस्या बम लगती हो, तो इसका समाधान हम हैं। अगर विश्व में सब हम हो जाए, तो हमें यह समस्या नहीं रह जाएगी । हम होना ही कई समस्याओं का समाधान हैं । ध्रुवीकरण को रोकना होगा, बिना लक्ष्य के हमें, हम होना होगा । सतहीय संकीर्णता का नाश आवश्यक हैं । अगर लक्ष्य लेकर हम बनें तो विकृतियाँ  आ सकती हैं ।
हमें क्रांति लानी होगी, पर इस के लिए उर्जा के ज्वार की आवश्यकता होगी । परन्तु क्रांति नियंत्रित नहीं होती है, इसमें कुछ खोने का डर अवश्य होता है, जो कि मूल्यवान होता हैं ।

आतंकवाद और नक्सलवाद समस्या से ज्यादा इसका निराकरण समस्याजन्य हैं ।
पहले आतंक  और वाद को समझे, वाद शीघ्र समाप्त हो जाते है, पर इनका प्रभाव चिर स्थाई होता हैं । आंतक कहाँ नहीं है ? और किसे नहीं है ? कहीं भी हो सकता है? पहले बालक माता-पिता से , फिर विद्यालय में शिक्षक से, बाहर मित्रों से, असामाजिक तत्वों से, घटनाओं से - दुर्घटनाओं से, भ्रष्टाचार-गरीबी-मंहगाई-अन्याय से, डर का लावा जब फूटता है, तो आंतक के रूप में दिखता हैं । यह डर की प्रतिक्रिया हैं । आतंकवाद के जनक अप्रत्यक्ष रूप से सभी ही हैं । अगर विश्व परिवेश में हम भयभीत है, तो आतंक  होता हैं । यह प्राकृत हैं । इसलिए हमें निर्भीक होना पडेगा। हमारी गतिविधियाँ भी वैसी रखनी होगी । उनका भय मिटाना होगा न कि ओर भयभीत कर आतंक बढ़ाए ।

देश ही क्यों ? विश्व विकसित हो, पर मूल आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति विकास नहीं हैं । हमने आज तक विकसित देश नहीं देखा, और जो मानते है ,यह उनका भ्रम हैं । कुछ बिन्दुओं को विकास का पैमाना नहीं होना चाहिए ।
उन्नत और पतन दोनों प्रक्रिया समान प्रतीत होती है,क्योंकि इसमें मानव प्रक्रिया के दौरान समझ नहीं पाता कि वह उन्नति की शिखर छुएगा कि पतन की गहराई ।

हमें संतुलन की अति आवश्कता है,पर जिस संतुलन के लिए हम क्रांति करते है, वह असंतुलन लाती हैं । पर यहाँ हमें संभल कर रहना होगा और फिर संतुलन तक चल सकें ।पढने के  लिए  धन्यवाद , गलती के लिए क्षमा ।








सोमवार, 28 मार्च 2016

शिक्षा

                                                    शिक्षा


प्राकृताचार उत्तम आचार हैं । पर मनुष्य अन्य प्राणियों में विशेष प्राणी है, जिसमें अन्य प्राणियों के अंत में क्रम हैं ।

 आज की शिक्षा ने दो धारी तलवार का काम किया हैं । शिक्षा से ज्ञान नहीं बढ़ा, ह्रास हुआ । छात्र  निर्दोष है, तो दोषी कौन ? आज विधिवत शिक्षा कहीं नहीं, उस शिक्षा का जीवन में प्रयोग नगण्य, अकर्मण्यता से अवसाद और व्यवहारिक दोषों का होना ।
जो कर सकता है, वह कर नहीं रहा और जो कर रहा है,वह भी गलत ।हम पहले ही कह चुकें, बात हृदय के आधार पर, मस्तिष्क का लेना देना नहीं, इसलिए हम युक्ति, तर्क, उदाहरण, सादृश्य का प्रयोग नहीं करेगें ।
उच्च स्तर पर विराजमान को पता नहीं कि नीचे क्या हो रहा हैं ? समस्या यह हैं । हमें साथ चलना होगा, मेरे हृदय में जो हो रहा वह हमारें हृदय में होना चाहिए । सूर्य को दीप दिखाना ठीक नहीं , पर रात्रि में चलना पड़े तो दीप काम करेगा । रात्रि में अंधकार का क्षेत्र है, सूर्य और दीप स्व प्रकाशित हैं ।
आडम्बर को समाप्त करना आवश्यक है, पर पूर्ण समाप्ति असंभव । समाज जिसे सत्य समझ रहा चुका है वास्तव में वह कुछ और ही हैं ।
पशुओं में मनुष्य से अच्छा अनुशासन होता है, और पशुओं से अच्छा अनुशासन  वृक्षों - पोधों  में देखा जा सकता है, कितना उत्तम हैं । मनुष्य पर निकृष्टता का कारण अज्ञात हैं । यह अंत: विज्ञान का विषय, इसकी चर्चा की मनाई हैं ।

प्रश्न परिभाषा का भी है, आप जिसकी परिभाषा जो करते हो, वह वैसी ही अन्तग्रहित की जाती हैं । हम अगर परिभाषा  ही बदल दें तो क्रांति का पहला मार्ग खुल सकेगा ।
हमें नया कुछ नहीं करना और हम नया कुछ कर भी नहीं सकते, सिर्फ खोजना है, जिसे हमनें खो दिया, या जिसकी ओर हम आँखे मुंदे खड़े हैं । इंसानों की  एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, पूरा नए संस्करण पर प्रभाव रह जाता है, परिवर्तन पूर्ण नहीं हो पाता हैं ।
वास्तव में खास, आम को समझ नहीं सकता और आम, खास को । खास जब आम होता है, तब समझता है, खास होते ही भूल जाता हैं । विज्ञान जिस आदर्शता  शत - प्रतिशत  को नकारता हैं । हमें उसी आदर्शता को शत - प्रतिशत करनें में जीवन लगाना होगा ।
विचार से ज्यादा कर्म करे पर वे यही करते हैं । हम विचार ज्यादा पर कर्म  नहीं करते यहीं विषय है ।
      
    
          

गुरुवार, 24 मार्च 2016

भ्रष्टाचार

समस्या है तो समाधान भी । मगर समाधान ही समस्या बन जाए तो फिर कुछ करना मुश्किल हो जाता हैं। आज हम जिस मस्तिष्क के गुलाम है, उसे  हमने अपना स्वयं का नियंत्रण दे दिया है, जबकि हमें हृदय का अनुगमन करना चाहिए ।इसलिए यहाँ वैज्ञानिकीय भाषा का प्रयोग नहीं हो सकेगा। क्योंकि हम उस विषय पर खड़े है, जिसका मार्ग गुप्त और अज्ञात सा है, अगर अभी गलत मार्ग चुन लिया तो मंजिल ही न मिल पाए । स्वप्न देखना अच्छा है, महत्वकांक्षा भी ,अतिवाद भी,परन्तु इस स्थिति में मनुष्य पाना चाहता है, पर वह सब कुछ खो बैठता है ।

                 भ्रष्टाचार

      भ्रष्टाचार एक विषय है । सर्वप्रथम हमें विवेक की आवश्कता है, प्रत्येक परिस्थिति में विवेक का मार्ग भिन्न है, और कुल समुच्च शून्य ही हो जाता है ।
जीवन सूत्रों पर जीना ठीक है, जीवन सूत्र नहीं है ।
भ्रष्टाचार के समाधान ही भविष्य की नई समस्या होगें। क्योंकि प्रत्येक निकाय का कार्य कुल समुच्चय शून्य कर देता है । कुछ सरल बातें करते है । हम स्वयं भ्रष्ट है,पर पता नहीं । सत्य, सर्वोच्च सत्य, व्यवहारिक सत्य और यथार्थ सभी अलग है । समाज की सतह का भ्रष्ट होना, गहराई में कुछ खराबी है । उस पर ध्यान लगाना चाहिए । अगर भ्रष्ट, दूसरे भ्रष्ट से भ्रष्टाचार का उन्मूलन का मार्ग पूछकर अनुसरण करें, तो उन्मूलन होगा ? नहीं होगा । शक्ति और काल का व्यर्थ प्रयोग रहा ।
भ्रष्टाचार को हटाना संभव है, मिटाना, समाप्त करना असंभव है । परन्तु हमें कार्य का मानक बनाना है, तो भ्रष्टाचार मिटाने के कर्म में और भ्रष्टाचार को बढाना ठीक नहीं, हमें एक ऐसा आचार लाना होगा जो इस आचार का स्थान ले सके । और वो आचार पहले समाज में व्याप्त था,जिसे भ्रष्टाचार ने स्थानांतरित किया था । यह एक धीमी और असरदार प्रक्रिया है ।

हमारे विश्व में जो भ्रष्टाचार फैला है, और पनप रहा है, और उसकी जड़ का फैलाव नए-नए वृक्ष तैयार कर रहा हैं । इन सबका निराकरण तो नहीं, पर कुछ विशेष कर्म तो है, हमें पुनः शिष्टाचार का आगम कराना होगा । पर समय पुनः है यह कराएगा कौन ? कोई नहीं ।
संस्कृति अन्दर ही अन्दर खोखली हो रही है । ऋणात्मक विचार की मनाई और धनात्मक सोच की नीति आज का सूत्र है, पर सच है ऋणात्मक विचार और धनात्मक कर्म । भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए सूत्रों, मानसिक प्रक्रियाओं अथवा अन्य प्रक्रियाओं की शक्ति निर्वीय हो गई हैं । हम अन्त: ज्ञान की बात नहीं करेगें  । क्योंकि इसकी मनाई हैं । समयों, परिस्थियों और आवश्कताओं पर आज्ञा से प्रयोग होता हैं ।