न्यायालय
न्यायालय - न्याय का मंदिर और न्यायधीश, न्यायालय का ईश्वर सभी सर्वोच्च । न्याय स्वयं ईश्वर है । जहाँ न्याय नहीं, वहाँ ईश्वर नहीं, जहाँ ईश्वर नहीं, वहाँ प्रकृति नहीं, जीवन नहीं ।
न्यायालय और न्याय प्रक्रिया का सम्मान सदा रहा है, और सदा रहेगा ।
इसका व्यवहार समझ से परे है, यह सब मानव पर निर्भर करता हैं । पर मानव जो चाहे कर लें, पर मूल नहीं बदल सकता । न्याय - अन्याय, मानव दोनों करता है, पर उच्च संस्थनों में सिर्फ न्याय का स्थान होना चाहिए । होना चाहिए ? यह सोचने पर मजबूर करता है । न्यायालय, न्यायाधीश, न्याय प्रक्रिया, न्याय पर इंसान को बोलने का अधिकार है या नहीं? और हो या न हो पर मन में में उठे प्रश्नों का क्या ? प्रश्न अपने हल स्वयं खोजता हैं । हल को पाए बिना नहीं रह सकता ।
न्याय अपने आप में स्वयं सिद्ध हैं । और वह सभी को मिलता हैं ।
पर दीखता नहीं हैं । पर हम ने देखने और दिखने वाला न्याय बनाया है, तो फिर इस पर हम सुन और सुना भी सकते हैं । न्याय और न्याय से संबद्ध सभी विषयों पर बोल भी सकते है, मांग भी सकते हैं ।
इंसान से इंसान कोई अन्याय न कर दे, इसलिए इंसानों ने इंसान के लिए इन संस्थनों को बनाया हैं । पर इन संस्थनों में इन्सान ही होते है , यह भूल गया । इंसान स्वयं पूर्ण नहीं होते हैं । और गलती की गुंजाईश होती हैं । तो ठीक इस गलती पर बोला जा सकता हैं ।
नियमन न्याय से अलग हैं । नियमन के विषय में नियामक पर सब आ जाता हैं । तो समुदाय का दोष कहाँ ? हमने सभी संस्थाओं को हमारी सहुलियतों के लिए बनाया था, न की भस्मासुर ।
पढ़ने के लिए धन्यवाद और गलती के लिए क्षमा चाहता हूँ ।
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