मंगलवार, 29 मार्च 2016

राजनीति




आरक्षण का विचार एक समाधान था, पर अब इससे बड़ी समस्या कहीं नहीं । परिस्तिथियां बदलती है, समस्या और समाधान भी । उपस्थानिक जड़े काटने का मतलब नहीं होगा । हमें मूल पर कार्य करना होगा । इस विषय की चर्चा  बाद में भी हो सकती हैं ।

हमें विश्व से राजनीति नामक विशाल समस्या का निराकरण करना होगा, क्योंकि राजनीति तोडती हैं । जिस प्रमुख को राज करना है , वह तोड़ देते है, हम टूट कर कुछ नहीं हो सकते हैं ।
और फिर पतन की गहराई में हम चल दिए है, तो हमें फिर कुछ न सोच, कहानी जल्दी समाप्त कर दें ।
हमें विशाल हृदय बनाना होगा, हमें कर्मठ होना होगा, और हम बाह्य रूप से समाप्त हो भी गए तो हम नित्य, शाश्वत, अनादि रहेगें ।
जनसँख्या,बेरोजगारी,प्रदूष्ण कोई समस्या नहीं हैं । अगर हम, हम हो जाये । परन्तु हम होना ही समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान हैं ।
एक प्रयोग मात्र एक मिनिट तक सब ईमानदार हो जाए, तो हमें विकसित होने में  ज्यादा इंतजार की आवश्यकता नहीं होगी ।
नकल समाधान नहीं हैं । हमें मार्ग स्वयं चुनना होगा ।
समय रुकता नहीं, अत: जीवन में अवरोध बर्दाश्त नहीं,पर लय बिना जीना कुछ नहीं । जो दिख नहीं सकता उसे देखना, जिसे सुना ही नहीं उसे सुनना, अज्ञात को महसूस करना, उसी के साथ जीना ,उसी में एका हो जाना । फिर क्या विच्छेद ? क्या एका ? आनन्द और समाधि।
 मृत हुआ है, मानव ।
अब संस्कृति कौन लाएगा।

नैतिकता के ज्ञान का वाचनालय, किसके द्वारा वाचा जाएगा ।।

हे प्रलयकारी तंद्रा में कब तक मौज उठाएगा ।

धीरे - धीरे तेरा सुख तुझे निगलते जाएगा ।।

क्यों लाशों के साथ सोता है, 

क्यों लाशों के साथ जगता है,

क्यों लाशों में तू जीता है, क्यों लाशों में तू जीता है।।

पढ़ने के लिए धन्यवाद, गलती के क्षमा करें ।

 

आतंकवाद


                                    आतंकवाद

हमें सरकार की नहीं, सहकार की स्थापना करवानी चाहिए, विकास के लिए उत्तम हैं ।
अगर समस्या बम लगती हो, तो इसका समाधान हम हैं। अगर विश्व में सब हम हो जाए, तो हमें यह समस्या नहीं रह जाएगी । हम होना ही कई समस्याओं का समाधान हैं । ध्रुवीकरण को रोकना होगा, बिना लक्ष्य के हमें, हम होना होगा । सतहीय संकीर्णता का नाश आवश्यक हैं । अगर लक्ष्य लेकर हम बनें तो विकृतियाँ  आ सकती हैं ।
हमें क्रांति लानी होगी, पर इस के लिए उर्जा के ज्वार की आवश्यकता होगी । परन्तु क्रांति नियंत्रित नहीं होती है, इसमें कुछ खोने का डर अवश्य होता है, जो कि मूल्यवान होता हैं ।

आतंकवाद और नक्सलवाद समस्या से ज्यादा इसका निराकरण समस्याजन्य हैं ।
पहले आतंक  और वाद को समझे, वाद शीघ्र समाप्त हो जाते है, पर इनका प्रभाव चिर स्थाई होता हैं । आंतक कहाँ नहीं है ? और किसे नहीं है ? कहीं भी हो सकता है? पहले बालक माता-पिता से , फिर विद्यालय में शिक्षक से, बाहर मित्रों से, असामाजिक तत्वों से, घटनाओं से - दुर्घटनाओं से, भ्रष्टाचार-गरीबी-मंहगाई-अन्याय से, डर का लावा जब फूटता है, तो आंतक के रूप में दिखता हैं । यह डर की प्रतिक्रिया हैं । आतंकवाद के जनक अप्रत्यक्ष रूप से सभी ही हैं । अगर विश्व परिवेश में हम भयभीत है, तो आतंक  होता हैं । यह प्राकृत हैं । इसलिए हमें निर्भीक होना पडेगा। हमारी गतिविधियाँ भी वैसी रखनी होगी । उनका भय मिटाना होगा न कि ओर भयभीत कर आतंक बढ़ाए ।

देश ही क्यों ? विश्व विकसित हो, पर मूल आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति विकास नहीं हैं । हमने आज तक विकसित देश नहीं देखा, और जो मानते है ,यह उनका भ्रम हैं । कुछ बिन्दुओं को विकास का पैमाना नहीं होना चाहिए ।
उन्नत और पतन दोनों प्रक्रिया समान प्रतीत होती है,क्योंकि इसमें मानव प्रक्रिया के दौरान समझ नहीं पाता कि वह उन्नति की शिखर छुएगा कि पतन की गहराई ।

हमें संतुलन की अति आवश्कता है,पर जिस संतुलन के लिए हम क्रांति करते है, वह असंतुलन लाती हैं । पर यहाँ हमें संभल कर रहना होगा और फिर संतुलन तक चल सकें ।पढने के  लिए  धन्यवाद , गलती के लिए क्षमा ।








सोमवार, 28 मार्च 2016

शिक्षा

                                                    शिक्षा


प्राकृताचार उत्तम आचार हैं । पर मनुष्य अन्य प्राणियों में विशेष प्राणी है, जिसमें अन्य प्राणियों के अंत में क्रम हैं ।

 आज की शिक्षा ने दो धारी तलवार का काम किया हैं । शिक्षा से ज्ञान नहीं बढ़ा, ह्रास हुआ । छात्र  निर्दोष है, तो दोषी कौन ? आज विधिवत शिक्षा कहीं नहीं, उस शिक्षा का जीवन में प्रयोग नगण्य, अकर्मण्यता से अवसाद और व्यवहारिक दोषों का होना ।
जो कर सकता है, वह कर नहीं रहा और जो कर रहा है,वह भी गलत ।हम पहले ही कह चुकें, बात हृदय के आधार पर, मस्तिष्क का लेना देना नहीं, इसलिए हम युक्ति, तर्क, उदाहरण, सादृश्य का प्रयोग नहीं करेगें ।
उच्च स्तर पर विराजमान को पता नहीं कि नीचे क्या हो रहा हैं ? समस्या यह हैं । हमें साथ चलना होगा, मेरे हृदय में जो हो रहा वह हमारें हृदय में होना चाहिए । सूर्य को दीप दिखाना ठीक नहीं , पर रात्रि में चलना पड़े तो दीप काम करेगा । रात्रि में अंधकार का क्षेत्र है, सूर्य और दीप स्व प्रकाशित हैं ।
आडम्बर को समाप्त करना आवश्यक है, पर पूर्ण समाप्ति असंभव । समाज जिसे सत्य समझ रहा चुका है वास्तव में वह कुछ और ही हैं ।
पशुओं में मनुष्य से अच्छा अनुशासन होता है, और पशुओं से अच्छा अनुशासन  वृक्षों - पोधों  में देखा जा सकता है, कितना उत्तम हैं । मनुष्य पर निकृष्टता का कारण अज्ञात हैं । यह अंत: विज्ञान का विषय, इसकी चर्चा की मनाई हैं ।

प्रश्न परिभाषा का भी है, आप जिसकी परिभाषा जो करते हो, वह वैसी ही अन्तग्रहित की जाती हैं । हम अगर परिभाषा  ही बदल दें तो क्रांति का पहला मार्ग खुल सकेगा ।
हमें नया कुछ नहीं करना और हम नया कुछ कर भी नहीं सकते, सिर्फ खोजना है, जिसे हमनें खो दिया, या जिसकी ओर हम आँखे मुंदे खड़े हैं । इंसानों की  एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, पूरा नए संस्करण पर प्रभाव रह जाता है, परिवर्तन पूर्ण नहीं हो पाता हैं ।
वास्तव में खास, आम को समझ नहीं सकता और आम, खास को । खास जब आम होता है, तब समझता है, खास होते ही भूल जाता हैं । विज्ञान जिस आदर्शता  शत - प्रतिशत  को नकारता हैं । हमें उसी आदर्शता को शत - प्रतिशत करनें में जीवन लगाना होगा ।
विचार से ज्यादा कर्म करे पर वे यही करते हैं । हम विचार ज्यादा पर कर्म  नहीं करते यहीं विषय है ।
      
    
          

गुरुवार, 24 मार्च 2016

भ्रष्टाचार

समस्या है तो समाधान भी । मगर समाधान ही समस्या बन जाए तो फिर कुछ करना मुश्किल हो जाता हैं। आज हम जिस मस्तिष्क के गुलाम है, उसे  हमने अपना स्वयं का नियंत्रण दे दिया है, जबकि हमें हृदय का अनुगमन करना चाहिए ।इसलिए यहाँ वैज्ञानिकीय भाषा का प्रयोग नहीं हो सकेगा। क्योंकि हम उस विषय पर खड़े है, जिसका मार्ग गुप्त और अज्ञात सा है, अगर अभी गलत मार्ग चुन लिया तो मंजिल ही न मिल पाए । स्वप्न देखना अच्छा है, महत्वकांक्षा भी ,अतिवाद भी,परन्तु इस स्थिति में मनुष्य पाना चाहता है, पर वह सब कुछ खो बैठता है ।

                 भ्रष्टाचार

      भ्रष्टाचार एक विषय है । सर्वप्रथम हमें विवेक की आवश्कता है, प्रत्येक परिस्थिति में विवेक का मार्ग भिन्न है, और कुल समुच्च शून्य ही हो जाता है ।
जीवन सूत्रों पर जीना ठीक है, जीवन सूत्र नहीं है ।
भ्रष्टाचार के समाधान ही भविष्य की नई समस्या होगें। क्योंकि प्रत्येक निकाय का कार्य कुल समुच्चय शून्य कर देता है । कुछ सरल बातें करते है । हम स्वयं भ्रष्ट है,पर पता नहीं । सत्य, सर्वोच्च सत्य, व्यवहारिक सत्य और यथार्थ सभी अलग है । समाज की सतह का भ्रष्ट होना, गहराई में कुछ खराबी है । उस पर ध्यान लगाना चाहिए । अगर भ्रष्ट, दूसरे भ्रष्ट से भ्रष्टाचार का उन्मूलन का मार्ग पूछकर अनुसरण करें, तो उन्मूलन होगा ? नहीं होगा । शक्ति और काल का व्यर्थ प्रयोग रहा ।
भ्रष्टाचार को हटाना संभव है, मिटाना, समाप्त करना असंभव है । परन्तु हमें कार्य का मानक बनाना है, तो भ्रष्टाचार मिटाने के कर्म में और भ्रष्टाचार को बढाना ठीक नहीं, हमें एक ऐसा आचार लाना होगा जो इस आचार का स्थान ले सके । और वो आचार पहले समाज में व्याप्त था,जिसे भ्रष्टाचार ने स्थानांतरित किया था । यह एक धीमी और असरदार प्रक्रिया है ।

हमारे विश्व में जो भ्रष्टाचार फैला है, और पनप रहा है, और उसकी जड़ का फैलाव नए-नए वृक्ष तैयार कर रहा हैं । इन सबका निराकरण तो नहीं, पर कुछ विशेष कर्म तो है, हमें पुनः शिष्टाचार का आगम कराना होगा । पर समय पुनः है यह कराएगा कौन ? कोई नहीं ।
संस्कृति अन्दर ही अन्दर खोखली हो रही है । ऋणात्मक विचार की मनाई और धनात्मक सोच की नीति आज का सूत्र है, पर सच है ऋणात्मक विचार और धनात्मक कर्म । भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए सूत्रों, मानसिक प्रक्रियाओं अथवा अन्य प्रक्रियाओं की शक्ति निर्वीय हो गई हैं । हम अन्त: ज्ञान की बात नहीं करेगें  । क्योंकि इसकी मनाई हैं । समयों, परिस्थियों और आवश्कताओं पर आज्ञा से प्रयोग होता हैं ।